Thursday, January 17, 2008

सूरज-ए-इस्लाम


सूरज-ए-इस्लाम को उगे हुए चौदह सो साल हो गये। इस वक्त में इस की पाक शिक्षाऔ लर हजारों हमले हुए, हजारों बलाऐं हमलावर हुई, कभी ये बलाये कुफ्र की बदलियां बन कर छायीं तो कभी यज़ीदी फितना अगेजिया, तो कभी यहूदी तूफान बन कर, तो कभी ईसाई साजिश बन कर। मौजूदा जमाने भी आज मीडिया के रूप में बलाये शहद की मक्खियों के मानिन्द टूट पड़ी है। मगर अलहमदुलिल्लाह ये तमाम ताकते अजीमुश्शान चमकती किरणों से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो गयी। और खुदा का सच्चा मजहब आज भी उसी शान के साथ पूरी दुनिया को रोशन कर रहा है। इस की चमक में जर्रा बराबर भी फर्क नहीं आया। आज भी इसकी सुनहरी किरणें दुनिया में बसने वालो को जगमगा रही हैं और तरक्की और भलाई का पैगाम दे रही हैं। ये पैगाम बदस्तूर कयामत तक देती रहेगी।
इस्लाम एक गुलशन है, जो सदाबहार है। इस के बानी हजरत मुहम्मद रसूल अल्लाह (स0अ0) हैं, इसके सींचने वाले सिद्दीके अकबर(रजि0) हैं, परवान चढाने वाले फारूखे आजम(रजि0), लहलहाने वाले उस्मान गनी(रजि0) और आबयारी करने वाले अली (रजि0) हैं।आज दुनिया इस्लाम की अजमत का हसीन खुत्बा पढ रही है कि इस्लाम ही महबूब मजहब है। इस्लाम ही इनसान का मतलूब है, क्योंकि इनसान जब आया तो अमन व अमान का सिलसिला कायम करता हुआ आया। इस्लाम जब आया तो भाईचारे और मुहब्बत का परचम बुलन्द करता हुआ आया। इस्लाम की अच्छाई जर्रे जर्रे में मौजूद है।
जब दुनिया में दीने इस्लाम का चिराग जला न था, दुनिया की हर शै हैरान व परेशान थी। दुनिया में इन्सान अपने हकों को कम जानता था, जो नहीं के बराबर था। जब इस्लाम दुनिया में आया तो इन्सान को इन्सानियत मिली। इन्सानों ने इस्लाम की फितरत को जब धीरे-धीरे पहचाना और मानना शुरु किया तो दुनिया के इन्सानों में से चन्द लोगों को इस्लाम की अज़मत समझ में आयी- उन लोगों ने इस्लाम का परचम बुलन्द किया और दुनिया ने उनके कदम चूमे।
हज़रत अबु बकर सिद्दीक (रजि0) को सदाकत का खिताब मिला, हज़रत उमर (रजि0) को अदालत मिली हज़रत उस्मान गनी(रजि0) को सखावत मिली हज़रत अली (रजि0) को शुजाअत मिली।
इस्लाम ने जहां मर्दो को उनके हकों से नवाजा वहीं इस्लाम ने औरतों को भी बराबर का हक दिया। इस्लाम से पहले हों या बाद हर दूसरे मज़हबों में औरतों को उनके हकों से महरुम किया गया है। बेटे के मुकाबले बेटियों की पैदाईश पर हमेशा अफसोस किया गया। तालीम और तरबियत के मैदान में औरतों पर मर्दो को तरजीह दी गयी। इज्जत और एहतराम में हमेशा उस को नीचा दिखाया गया है लेकिन इस्लाम ने एक जीती जागती मिसाल पेश की है और बताया है कि औरत का वजूद समान है, वह इन्सानियत की जन्मदाता है, इस की गोद में तहजीब परवान चढती है, इल्म और हिकमत की कोपलें फूटती है और जिन्दगी के मकसद की राह हमवार होती है। इसलिए इस्लाम ने हुक्म दिया है के मॉ की खिदमत हज और जिहाद से अफजल है। रहमत-ए-आलम (सल्ल0) ने इरशाद फरमाया है। “हर मुसलमान मर्द और औरत पर शिक्षा हासिल करना फर्ज है।”
इस्लाम अल्लाह सुब्हाना वा ताला का सबसे खूबसूरत तोहफा है जिसके लिए हमें उस मौला-ए-कायनात का शुक्र अदा करना चाहिए।
और प्यारे नबी हुजूर पाक स0अ0व0 की शिक्षा को ग्रहण करें, या दीनी शिक्षा के साथ दुनियावी शिक्षा सीखे ओर सिखाये, और एक सच्चे-पक्के मुसलमान बने। हमारे दिल की धड़कनों में फारूके आजम(रजि0) का एसार हो, हमारे जेहन व दिमाग में खालिद बिन वलीद का जोश हो, हमारे बाजुओं में मौला-ए-कायनात का जोर हो, किरदार में मुहम्मद बिन कासिम का जज्बा-ए-इश्क हो और हमारे सामने सलाह उद्दीन अय्यूबी के अजीम कारनामें हों। हमारे दिल में जज्बा हो कि जब तक जिस्म में जान है इस्लाम के उसूल पामाल नहीं होने देंगे। यह तभी मुमकिन हो सकता है जब हम अपने ही घरों से शुरुआत करें। शिक्षा को बढावा दें, प्यार, मोहब्बत और आपसी भाईचारे के साथ मिलजुल कर एक दूसरे की मदद करें और सोच लें कि अल्लाह की राह में जो कुछ बन सकेगा करेंगे, अपने प्यारे नबी (सल्ल0) की शिक्षा के सहारे जिन्दगी गुजारेंगे। छोटो का अदब, बड़ो का लिहाज और अपने फराईज को खुश असलूबी से अन्जाम देंगे।( आमीन )

1 comment:

Snehal Patel said...

सलाम.. हज़रत अबु बकर सिद्दीक (रजि0) को सदाकत का खिताब मिला, हज़रत उमर (रजि0) को अदालत मिली हज़रत उस्मान गनी(रजि0) को सखावत मिली हज़रत अली (रजि0) को शुजाअत मिली।
ये सदाकत अदालत सखावत हिंदी में समझा सकते हैं क्योंकि यह उर्दू शब्द समझ नहीं आते हैं